ईको टूरिज्म में 1.63 करोड़ की गड़बड़ी, सूचना आयोग ने मांगी पूरी जानकारी

ईको टूरिज्म में 1.63 करोड़ की गड़बड़ी, सूचना आयोग ने मांगी पूरी जानकारी

उत्तराखंड राज्य सूचना आयोग ने पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी में ईको हट्स और ईको टूरिज्म सुविधाओं के निर्माण में कथित अनियमितताओं के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए वन विभाग के लोक सूचना अधिकारी (PIO) को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि यदि जांच पूरी हो

उत्तराखंड राज्य सूचना आयोग ने पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी में ईको हट्स और ईको टूरिज्म सुविधाओं के निर्माण में कथित अनियमितताओं के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए वन विभाग के लोक सूचना अधिकारी (PIO) को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि यदि जांच पूरी हो चुकी है तो सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई समस्त जानकारी 15 दिनों के भीतर आवेदक को उपलब्ध कराई जाए।

यह मामला उस समय चर्चा में आया था जब वन विभाग की जांच में मुनस्यारी में ईको टूरिज्म परियोजना के नाम पर करीब 1.63 करोड़ रुपये की गड़बड़ी सामने आई थी। आरोप तत्कालीन डीएफओ और आईएफएस अधिकारी विनय भार्गव के कार्यकाल से जुड़े हैं।

आरटीआई में मांगी गई पूरी कार्रवाई का ब्यौरा

गुरुग्राम (हरियाणा) निवासी हरिंदर धींगरा ने आरटीआई आवेदन के माध्यम से तत्कालीन डीएफओ आईएफएस विनय भार्गव के विरुद्ध की गई समस्त विभागीय कार्रवाई, जांच रिपोर्ट और संबंधित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं।

आयोग ने सुनवाई के दौरान संबंधित लोक सूचना अधिकारी को निर्देशित किया कि—

यदि मामले की जांच पूरी हो चुकी है, तो उसकी पूरी रिपोर्ट और कार्रवाई का ब्यौरा 15 दिनों के भीतर उपलब्ध कराया जाए।
यदि जांच अभी लंबित है, तो उसके पूर्ण होते ही 15 दिनों के भीतर समस्त जानकारी आवेदक को दी जाए।
प्रमुख सचिव वन को भेजा गया था पत्र
उल्लेखनीय है कि मामले में प्रमुख सचिव (वन) को पत्र भेजकर विस्तृत जांच रिपोर्ट और दोषियों के विरुद्ध की गई कार्रवाई की जानकारी भी मांगी गई थी। अब राज्य सूचना आयोग के निर्देश के बाद वन विभाग पर पारदर्शिता सुनिश्चित करने का दबाव बढ़ गया है।
पारदर्शिता पर आयोग की मुहर
राज्य सूचना आयोग का यह आदेश स्पष्ट संकेत देता है कि सार्वजनिक धन से संचालित परियोजनाओं में पारदर्शिता अनिवार्य है और सूचना देने में अनावश्यक देरी स्वीकार नहीं की जाएगी।
अब सबकी निगाहें वन विभाग पर टिकी हैं कि वह निर्धारित समयसीमा में जांच रिपोर्ट और कार्रवाई का पूरा विवरण सार्वजनिक करता है या नहीं। यह मामला न केवल वन विभाग बल्कि ईको टूरिज्म परियोजनाओं की निगरानी और जवाबदेही पर भी सवाल खड़े कर रहा है।

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