चमोली/पौड़ी। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में चढ़ते पारे के साथ ही वनाग्नि (जंगलों की आग) ने विकराल रूप धारण कर लिया है। चमोली जिले के बदरीनाथ रेंज और नारायणबगड़ के जंगलों में आग धूं-धूं कर जल रही है। इस बीच, चमोली से आग बुझाने के
चमोली/पौड़ी।
उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में चढ़ते पारे के साथ ही वनाग्नि (जंगलों की आग) ने विकराल रूप धारण कर लिया है। चमोली जिले के बदरीनाथ रेंज और नारायणबगड़ के जंगलों में आग धूं-धूं कर जल रही है। इस बीच, चमोली से आग बुझाने के दौरान एक बेहद दर्दनाक और झकझोर देने वाली घटना सामने आई है, जहां अपनी जान जोखिम में डालकर वनाग्नि पर काबू पाने की कोशिश कर रहे एक फायर वॉचर की पहाड़ी से गिरकर मौत हो गई। इस घटना के बाद मृतक के परिजनों और स्थानीय ग्रामीणों में वन विभाग के खिलाफ भारी आक्रोश है।

8 साल से सेवा दे रहे फायर वॉचर की गई जान
जानकारी के मुताबिक, बदरीनाथ वन प्रभाग के बिरही क्षेत्र में 20 मई की शाम वन विभाग की टीम आग बुझाने के लिए जंगल में उतरी थी। इसी दौरान पाखी-जलग्वाड़ निवासी 43 वर्षीय फायर वॉचर राजेंद्र सिंह (पुत्र नंदन सिंह) अचानक संतुलन बिगड़ने से एक गहरी चट्टान से नीचे गिर गए। हादसा इतना भयानक था कि मौके पर ही उनकी मौत हो गई।
राजेंद्र सिंह पिछले 8 वर्षों से वन विभाग में फायर वॉचर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे और वे अपने परिवार में एकमात्र कमाने वाले सदस्य थे। घटना की सूचना मिलते ही वन विभाग के आला अधिकारी और पीड़ित परिवार मौके पर पहुंचे।
बिना संसाधनों के जान जोखिम में डाल रहे कर्मी, ग्रामीणों का फूटा गुस्सा
इस दर्दनाक हादसे के बाद गुस्साए ग्रामीणों और परिजनों ने वन विभाग के अधिकारियों का घेराव किया। ग्रामीणों ने सरकार और विभाग पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए मृतक के परिवार के लिए उचित मुआवजे और उनकी पत्नी को सरकारी नौकरी देने की मांग की है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि:
“सरकार ने फायर वॉचर तो नियुक्त कर दिए हैं, लेकिन उन्हें सुरक्षा के लिए कोई पुख्ता संसाधन नहीं दिए गए हैं। बिना सुरक्षा उपकरणों और आधुनिक संसाधनों के ये वनाकर्मी और फायर वॉचर अपनी जान हथेली पर रखकर आग बुझा रहे हैं।”
क्या है वन प्रभाग (DFO) का रुख?
मामले पर बदरीनाथ वन प्रभाग के प्रभागीय वन अधिकारी (DFO) सर्वेश दुबे ने बताया कि फायर वॉचर स्थायी कर्मचारी नहीं होते हैं; उन्हें केवल 3 महीने के फायर सीजन के लिए अनुबंधित किया जाता है। हालांकि, विभाग की तरफ से उनका जोखिम बीमा कराया जाता है। इस दुर्घटना की स्थिति में बीमा के तहत परिवार को लगभग 10 लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता राशि दी जा सकती है।
नारायणबगड़ में हजारों शिशु पौधे जलकर खाक, पौड़ी में भी हाहाकार
चमोली के ही नारायणबगड़ क्षेत्र के पश्चिमी पिंडर रेंज में लगी आग ने वन विभाग के पौधारोपण दावों की पोल खोल दी है। लेगुना गांव के नीचे वन भूमि में लगी भीषण आग के कारण वर्ष 2025 में रोपे गए लगभग 5500 शिशु पौधे जलकर पूरी तरह राख हो गए, जिससे लाखों रुपये की वन संपदा नष्ट हो गई।
दूसरी ओर, पौड़ी-देवप्रयाग मोटर मार्ग पर सबदरखाल और बुआखाल के समीप भी जंगलों में भीषण आग लगी हुई है। आग इतनी विकराल है कि लपटें दूर-दूर से दिखाई दे रही हैं और पूरा इलाका धुएं के गुबार में तब्दील हो चुका है।
वन्यजीवों पर मंडराया संकट, बढ़ सकता है मानव-वन्यजीव संघर्ष
लगातार धधकते जंगलों के कारण अब वन्यजीव भी सुरक्षित नहीं हैं। पानी और सुरक्षित ठिकानों की तलाश में जंगली जानवर रिहायशी इलाकों का रुख करने को मजबूर हो रहे हैं। जानकारों का मानना है कि यदि आग पर जल्द काबू नहीं पाया गया, तो आने वाले दिनों में मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) की घटनाएं तेजी से बढ़ सकती हैं।
आमतौर पर 15 फरवरी से शुरू होने वाले फायर सीजन में इस बार मई की शुरुआत तक हुई बारिश के चलते नमी बनी हुई थी, जिससे आग पर नियंत्रण था। लेकिन अब भीषण गर्मी, तपती धूप और तेज हवाओं के कारण स्थिति पूरी तरह बेकाबू हो चुकी है।







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