देहरादून: उत्तराखंड के सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर एक बार फिर गंभीर चिंता सामने आई है। राष्ट्रीय सेमिनार में प्रस्तुत एक शोधपत्र में खुलासा हुआ है कि प्रदेश के कई सरकारी स्कूलों में एक ही शिक्षक कई–कई विषय पढ़ाने को मजबूर है,
देहरादून:
उत्तराखंड के सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर एक बार फिर गंभीर चिंता सामने आई है। राष्ट्रीय सेमिनार में प्रस्तुत एक शोधपत्र में खुलासा हुआ है कि प्रदेश के कई सरकारी स्कूलों में एक ही शिक्षक कई–कई विषय पढ़ाने को मजबूर है, जिसके चलते विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल पा रही है।
चंपावत में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार में राजनीति विज्ञान के प्रवक्ता डॉ. अंकित जोशी द्वारा प्रस्तुत शोधपत्र में कहा गया कि उत्तराखंड सहित देश के अनेक राज्यों में विद्यालयों तक भौतिक पहुंच तो लगभग सुनिश्चित हो चुकी है, लेकिन गुणवत्तापूर्ण और समान शिक्षा अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
शोध में सामने आया है कि ‘परख’ की शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार प्रदेश के बच्चों में भाषा, गणित और तर्क–क्षमता से जुड़े मूलभूत कौशल कमजोर हैं। बड़ी संख्या में छात्र अपनी कक्षा से नीचे के स्तर का पाठ भी ठीक से नहीं पढ़ पा रहे। वहीं, पीजीआई सूचकांक में भी उत्तराखंड को सीखने के परिणाम, शैक्षिक प्रबंधन और संसाधन विकास के क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम अंक मिले हैं।
नामांकन में गिरावट, पहाड़ों में हालात ज्यादा गंभीर
शोधपत्र में बताया गया कि राज्य के कई प्राथमिक विद्यालय शून्य नामांकन की स्थिति में पहुंच चुके हैं, जबकि माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों में औसतन छात्र संख्या 40–50 रह गई है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अभाव में अभिभावक निजी स्कूलों और मैदानी क्षेत्रों की ओर पलायन कर रहे हैं।
स्कूल कॉम्प्लेक्स नीति पर भी सवाल
नई शिक्षा नीति के तहत स्कूल कॉम्प्लेक्स की अवधारणा को सहयोग और संसाधन साझाकरण के लिए लाया गया था, लेकिन उत्तराखंड में इसे विद्यालयों के विलय के रूप में लागू किया जा रहा है, जिससे दूरस्थ क्षेत्रों के छात्रों की स्कूल तक पहुंच और कठिन हो गई है।
शैक्षिक गिरावट की प्रमुख वजहें
विषय–विशेषज्ञ शिक्षकों की भारी कमी
प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों और डिजिटल संसाधनों का अभाव
कमजोर प्रारंभिक साक्षरता और गणितीय क्षमता
स्थानीय भाषा और शिक्षा की भाषा के बीच अंतर
समाधान भी सुझाए
शोधपत्र में सीखने के परिणामों को केंद्र में रखकर शिक्षा की पुनर्रचना, कक्षावार–विषयवार शिक्षकों की नियुक्ति और पर्वतीय क्षेत्रों के लिए विशेष प्रोत्साहन नीति लागू करने की सिफारिश की गई है।
शोध के निष्कर्ष स्पष्ट संकेत देते हैं कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो उत्तराखंड में सरकारी शिक्षा व्यवस्था और अधिक कमजोर हो सकती है।











Leave a Comment
Your email address will not be published. Required fields are marked with *