सीईओ अंकिता की कार को लेकर डीएम–कैंट बोर्ड में टकराव

सीईओ अंकिता की कार को लेकर डीएम–कैंट बोर्ड में टकराव

देहरादून: आखिर देहरादून में क्लेमेनटाउन कैंट बोर्ड सीईओ अंकिता सिंह की कार में ऐसा क्या है कि जिला प्रशासन बार बार अति आवश्यक कार्य का हवाला देकर उसका अधिग्रहण करने पहुंच जाता है। इस बार भी प्रशासन के हाथ फिलहाल कुछ नहीं लग पाया। जबकि

देहरादून:

आखिर देहरादून में क्लेमेनटाउन कैंट बोर्ड सीईओ अंकिता सिंह की कार में ऐसा क्या है कि जिला प्रशासन बार बार अति आवश्यक कार्य का हवाला देकर उसका अधिग्रहण करने पहुंच जाता है। इस बार भी प्रशासन के हाथ फिलहाल कुछ नहीं लग पाया। जबकि सिटी मजिस्ट्रेट, तहसीलदार और एआरटीओ समेत पुलिस कर्मी उनके कमरे के बाहर सोमवार को डटे रहे। लेकिन, इस बार सीईओ अंकिता सिंह ने जो किया, उसका अंदाजा भी डीएम सविन बंसल को नहीं रहा होगा। अंकिता ने उल्टे पूछ लिया कि आपात स्थिति बताएं, कैंट बोर्ड प्रशासन को किराए पर वाहन लेकर मुहैया करा देगा।

सोमवार को जब जिला प्रशासन और परिवहन विभाग की संयुक्त टीम कैंट बोर्ड कार्यालय पहुंची, तो उन्हें वहां से सीधा और चौंकाने वाला जवाब मिला। सीईओ अंकिता सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पहले प्रशासन यह बताए कि वाहन अधिग्रहण के लिए आपात स्थिति आखिर है क्या? उन्होंने यह भी कहा कि यदि प्रशासन को वाहन की आवश्यकता है तो कैंट बोर्ड किराए पर वाहन लेकर उपलब्ध करा सकता है, लेकिन बोर्ड का एकमात्र सरकारी वाहन देना संभव नहीं।

दूसरी बार भी खाली हाथ लौटी टीम
यह पहला मौका नहीं है। इससे दो दिन पहले भी जिला प्रशासन और परिवहन विभाग की टीम रात के समय सीईओ के आवास पर पहुंची थी। तब भी अंकिता सिंह ने वाहन देने से इनकार करते हुए कानूनी सवाल खड़े कर दिए थे, जिसके बाद टीम को लौटना पड़ा।

दूसरी बार प्रशासन पूरी तैयारी के साथ दोबारा कैंट बोर्ड पहुंचा और इस बार वाहन अधिग्रहण का नोटिस व्यक्तिगत रूप से रिसीव भी कराया, लेकिन नतीजा वही रहा। इस बार सीईओ ने सीधे प्रशासन की मंशा पर ही सवाल उठा डाले। हालांकि, यह सवाल आम जनता के भी हैं कि आखिर साधन संपन्न राजधानी के प्रशासन को वाहन की ऐसी किल्लत कैसे हो गई कि वह एक सीनियर क्लास वन महिला अफसर के वाहन का इतना तलबगार हो गया।

कानून की वैधता पर सीधा सवाल
सीईओ अंकिता सिंह ने प्रशासन द्वारा लागू किए जा रहे यूपी मोटर व्हीकल (इमरजेंसी पावर्स) एक्ट, 1947 पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यह कानून ब्रिटिशकाल में यूनाइटेड प्रोविंस में दंगा नियंत्रण के लिए बनाया गया था। उन्होंने प्रशासन से सीधा प्रश्न किया कि यह कानून उत्तराखंड में कब और किस आदेश से लागू हुआ?

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